वेस्ट बंगाल ने किया बीजेपी को चौकन्ना, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटों पर टिकी निगाह
लखनऊ। यूपी में बदले सियासी समीकरण साधने का प्रश्न उठ खड़ा हुआ है। बीजेपी हाईकमान रिस्क लेने के मूड में तनिक भी नहीं है। यू पी नहीं मिला तो दिल्ली दूर हो सकती है। वाया उत्तर प्रदेश ही दिल्ली में फहराया भगवा। 2014 ,2017 और 2019 में जो माहौल था वो अब नहीं है।
इसे नकार नहीं सकत हैं। 2022 में फतेह हुई तो 2024 में भी बल्ले बल्ले तय है वर्ना पेशानी पर बल पड़ना भी निश्चित ही समझो। बीजेपी के चाणक्य की नजर से कुछ छिपा नहीं है। वेस्ट बंगाल के चुनाव नतीजों ने तो और चौकन्ना कर दिया है। अब उत्तर प्रदेश में हर कदम संभल कर ही रखेंगे। बाद मशक्कत कोविड-19 से निपटने में सीएम योगी आदित्यनाथ सफलता के करीब पहुंचे हैं। समस्याओं का इस सूबे में अम्बार है। बहुत से परिवारों ने किसी न किसी अपने को खोया है। जिसे आक्सीजन के अभाव में दुनिया से रुख्सत होना पड़ा है, उसके परिवार तबाह हो गये हैं। उनको सम्बल नहीं मिला और वो नाखुश हैं। किसान आंदोलन भले ही दिल्ली बार्डर पर चल रहा है और पुकार मोदी सरकार को रहा है, मगर मतदान तो 2022 में प्रदेश सरकार बनाने की खातिर करेगा। बीजेपी अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर तैयारी में जुट गई है।
खास ध्यान पश्चिमी उत्तर प्रदेश पर है। पार्टी पदाधिकारियों की बैठक शनिवार को इसी सिलसिले में हुई। बैठक वृंदावन के घ्केशवधाम में हुई, जिसकी सदारत पार्टी के महासचिव संगठन सुनील बंसल ने की। सुनील बंसल ने पार्टी कार्यकर्ताओं को बूथ स्तर तक अनुकूल माहौल बनाने के लिए तैयार करने पर जोर दिया। सूत्रों की मानें तो बैठक में पार्टी के नेताओं ने महामारी से निपटने में सरकार की चूक को लेकर लोगों के बीच नाराजगी को शांत करने के लिए स्त्रिरय कदम उठाने का फैसला किया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा की परेशानी बढ़ सकती है। इस क्षेत्र में किसान आंदोलन का असर है। प्रदेश में जाटों की आबादी 6 से 8 प्रतिशत है, लेकिन पश्चिमी यूपी में जाट 17 फीसद से अधिक हैं। सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, बिजनौर, गाजियाबाद, मुरादाबाद, संभल, अमरोहा, बुलंदशहर, हाथरस, अलीगढ़, नगीना, फतेहपुर सीकरी और फिरोजाबाद में जाटों अच्छी खासी जनसंख्या है। इन जिलों में गुर्जरों की संख्या भी कम नहीं है, लेकिन जाट ज्यादा हैं। विधानसभा चुनाव 2022 को लेकर सभी दल जाट वोटों को लेकर स्त्रिरय है। भारतीय जनता पार्टी ने तो अपना पूरा ध्यान इसी पर केंद्रित किया है। लोकसभा चुनाव हो या विधानसभा चुनाव, जाट मतदाता जिसपर मेहरबान उसका बेड़ा पार। 2017 में हुए यूपी विधानसभा चुनाव और 2019 का लोकसभा चुनाव में यह बात सच हो चुकी है। 2014 के लोकसभा चुनाव में जाटों ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सभी लोकसभा सीटें भाजपा के खाते में डलवा दी थीं। 2019 के लोकसभा चुनाव में भी ऐसा ही रहा। सपा-बसपा और रालोद का मजबूत गठबंधन भी पिट गया था लेकिन अब हालात डिफरेंट हैं। अखिलेश और जयन्त चौधरी फिर साथ हैं। जयंत चौधरी दिल्ली बार्डर गये और खुलकर तीनो कृषि कानूनों को किसान विरोधी करार देते हुए राकेश टिकैत को साथ होने का आश्वासन भी दिया। चौधरी अजित सिंह अब नहीं हैं किंतु उनके प्रति प्यार बढ़ा है जो सहानुभूति बनकर छोटे चौधरी पर उमड़ पड़े तो हैरत नहीं होगी।
Edit by : Vishal Jaiswal

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